कला संस्कृति

Corona Pandemic: न मेला  (fair) न रेला, कौतिकार से लेकर दुकानदार सब मायूस

मेले, त्यौहार और धार्मिक उत्सव कुमाऊँ के जन-जीवन  के अभिन्न हिस्से हैं। ये  पूरे वर्ष भर  विभिन्न स्थानों और समय पर मनाए जाते हैं। इन में प्रमुख हैं- नंदा देवी (Nandadevi )का मेला  जो कि सितंबर माह में मुख्य रूप से अल्मोड़ा शहर में आयोजित होता है । इसके अलावा यह नैनीताल में भी आयोजित होता है । देवीधुरा का बग्वाल मेला (Devidhura bagwal ) अपने आप में अनोखा और प्रसिद्ध है। जो कि मां बाराही देवी के मंदिर में रक्षाबंधन के दिन आयोजित किया जाता है । पूर्णागिरि  मेला चैत्र की नवरात्री यानि मार्च -अप्रेल में पूर्णागिरि देवी के मंदिर मे आयोजित होता है।  चैती मेला काशीपुर में बसंत पंचमी के नवरात्रों में आयोजित किया जाता  है। उत्तरायणी मेला कुमाऊँ  क्षेत्र के विभिन्न स्थानों पर आयोजित किया जाता है जिसमें प्रमुख हैं बागेश्वर, चित्रशीला, सल्ट महादेव। यह मेला जनवरी माह में मकर संक्रांति के दिन आयोजित किया जाता  है। पिथौरागढ़ के कुछ हिस्सों में हिलजात्रा मेले ( hiljatra festival) का भी  आयोजन किया जाता है। जो कि मुख्य रूप से चरवाहा लोगों का एक त्यौहार है। यह  त्यौहार बरसात  में धान रोपाई के समय  मनाया जाता है। कोरोना के दौर में उत्तराखंड के मेलों को भी ग्रहण लग गया है। इस बार न जागेश्वर( Jageshwar Shravani mela)में श्रावणी मेला लगेगा, न देवीधुरा में बग्वाल खेली जाएगी और न अल्मोड़ा में नंदादेवी मेला लगेगा। 

By Hema Kabdal, Delhi

अधिकांश कुमाऊं  के प्रमुख त्यौहार वही हैं जो हिन्दुओं द्वारा पूरे उत्तर भारत  में मनाये जाते हैं जैसे होली, दिवाली, रक्षाबंधन, दशहरा, जनमाष्टमी, शिवरात्रि, बसंतपंचमी आदि । किंतु इसके अलावा कुमाऊं क्षेत्र के अपने कुछ  विशिष्ट त्यौहार भी हैं। इनमें प्रमुख हैं- उत्तरायणी यानी घुघुतिया जो कि उत्तरायणी मकर संक्रांति यानि जनवरी माह में समस्त कुमाऊं क्षेत्र में बड़े धूम धाम  से मनाया जाता है। दूसरा प्रमुख त्यौहार है हरेला यह  श्रावण माह के आरम्भ में यानि मध्य जुलाई में  मनाया जाता है। इसके अतिरिक्त अन्य त्यौहार हैं- बिखौती, हरिशयनी एकादशी,  घी संक्रांति या ओलगिया,  संकट चतुर्थी,  हरताली व्रत, फूलदेइ, खतडुवा  आदि। इस प्रकार  कुमाऊं क्षेत्र के विभिन्न भागों में वर्ष भर समय समय पर कई मेलेए उत्सवों और त्यौहारों को मनाया  जाता है।

 जागेश्वर श्रावणी मेले से जुड़े लोग निराश

 अल्मोड़ा से करीब 37 किलोमीटर दूर जागनाथ धाम में श्रावण के महीने में प्रतिवर्ष 15 जुलाई से 16 अगस्त तक श्रावणी मेले का आयोजन किया जाता है।  यह मेला पूरे  एक माह तक चलता है। भगवान जागनाथ का यह मंदिर आठवीं- नौवीं शताब्दी में कत्यूरी काल में बनाया गया  था।  इस मंदिर समूह में कुल 124 छोटे बड़े मंदिर हैं जो  कत्यूरी, उत्तर कत्यूरी तथा कुछ चंद काल में बनाए गए। ऐसा माना जाता है कि भगवान  जागनाथ का यह  मंदिर भारत में भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है।

वैसे तो पूरे वर्ष भर श्रद्धालु और पर्यटक यहां पर भगवान शिव की पूजा अर्चना और महामृत्युंजय जाप करने के लिए आते रहते हैं। किंतु मेले के दौरान आस-पास के गाँवों और दूरदराज के इलाके से बड़ी संख्या में लोग ना केवल पूजा अर्चना के लिए  बल्कि मेले में से खरीदारी करने और अपने घर के उत्पादों का विक्रय करने के लिए भी यहां पर आते हैं।

यहां पर ग्रामीण लोग अपने रोजमर्रा की काम की चीजें जैसे डाले, सुपे,दराती, कुदाल,जाल, रस्सी आदि चीजों को सही दाम पर खरीद सकते हैं। साथ ही जो लोग इन वस्तुओं को अपने घर पर बनाते हैं वह अपना सामान लेकर यहां बेचने आते हैं ।  जिससे उनकी कुछ आमदनी हो जाती है।  इसके अतिरिक्त ग्रामीण लोग यहां पर अपने घरों में पैदा की गई फल और सब्जियां भी  बेचने के लिए लाते हैं। इस प्रकार यह ग्रामीण लोगों को  एक सुलभ रोजगार का साधन भी प्रदान करता है। ना केवल  ग्रामीणों को बल्कि स्थानीय जागेश्वर के लोगों को भी इस समय पर फूल, बेलपत्र, पार्थिव पूजा के  लिए मिट्टी की पिंडिया यहां  आए  श्रद्धालुओं को बेचकर  अल्पकालिक रोजगार मिल जाता है। स्थानीय लोगों के साथ-साथ यहां पर उत्तराखंड के विभिन्न जगहों से व्यापारी लोग अपना सामान लाकर बेचते हैं जिसमें गलीच, दरिया, शाल  और  ग्रामीण लोगों के रोजमर्रा के काम आने वाली वस्तुएं होती हैं।  जिसे  ग्रामीण  यहाँ से  उचित दाम में खरीद सकते  हैं।  लोगों के मनोरंजन के लिए यहां पर झूले भी लगाए जाते हैं।  मेले के दौरान यहां पर लोगों की भीड़ रहती है ।

दुख:द बात यह है कि इस बार कोरोना महामारी की वजह से जागेश्वर में श्रावणी मेले का आयोजन नहीं हो पा रहा है। इससे न केवल  मेले में भाग लेने वाले श्रद्धालु बल्कि वो ग्रामीण और स्थानीय लोग भी, जो मेले में  अपने उत्पादों की बिक्री करके कुछ आए कमा लेते थे, निराश हैं।

मेलों का सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक महत्व 

 मेलों, तीज-त्यौहारों और उत्सवों का समाज में एक महत्वपूर्ण स्थान है। मानव सभ्यता के विकास के साथ-साथ इनकी भी  आवश्यकता अनुभव की गई।  आदिकाल में लोगों के पास मेल-मिलाप,  मनोरंजन,  विचारों के आदान-प्रदान और खुशियां मनाने का यही एकमात्र साधन थे।  समय के साथ साथ यातायात, मनोरंजन और जनसंचार के साधनों का भी विकास हुआ ।  इसके साथ-साथ विभिन्न संस्कृतियों- खान पान रिती-रिवाज पहनावा इत्यादि का भी आदान-प्रदान हुआ। इससे जनमानस में एकता समरसता और सहृदयता का विकास हुआ।

मेले का अर्थ है धार्मिक, सामाजिक और आर्थिक कारणों से एक जगह पर मेल मिलाप।  यही मेल मिलाप  आगे चलकर आर्थिक गतिविधियों का भी केंद्र बन गया। पुराने समय में लोग इन्ही मेलों में अपनी वस्तुओं का विनय  किया करते थे।  जिस व्यक्ति के पास जो सामान अपनी आवश्यकता से अधिक होता था वह उसे  विनिमय करके अपनी जरूरत का दूसरा सामान दूसरे व्यक्तियों से ले लेता था।  इस प्रकार से सभी लोगों की परस्पर आवश्यकताओं की पूर्ति होती थी । समय के साथ साथ  वस्तुओं के विनिमय और क्रय विक्रय का तरीका भी बदल गया।  अब  स्थानीय लोग गाँवों से  अपना सामान लेकर मेलों में आते हैं और इसे बेचकर  दूसरा सामान खरीद लेते हैं।  इस प्रकार से लोग अपनी अपनी जरूरतों का सामान आसानी से प्राप्त कर सकते थे। दूसरी तरफ वो  विक्रेता यानी व्यापारी जो जगह जगह लगने वाले मेलों में  अपना सामान  बेचते हैं  और उससे  अपने तथा  परिवार का भरण पोषण करते हैं । इस प्रकार कई  व्यक्तियों की रोजी-रोटी इन मेलों पर ही निर्भर करती है ।

 

स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के दौर मेलों का भविष्य

समय के साथ साथ यातायात के साधनों और जन  संचार के माध्यमों-अखबार, रेडियो, सिनेमा, टीवी इत्यादि का भी विकास हुआ। पहले जनसंचार के माध्यमों में प्रमुख रूप से सिर्फ अखबार और रेडियो ही  हुआ करते थे। 50 के दशक के आसपास  टेलीविजन का पदार्पण हुआ जो कि 80  के दशक तक  आते-आते मनोरंजन का मुख्य साधन बन गया। फिर आया  स्मार्टफोन और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म । जिसके आगे  सारे परंपरागत मनोरंजन और जनसंचार के माध्यम फीके पड़ गए।  इसके साथ ही मेलों, उत्सवों और त्यौहारों  को आयोजित करने और मनाने के तरीके में  भी बड़ा परिवर्तन नजर आने लगा।

आज मेलों को आयोजित करने की वजह धार्मिक कम बल्कि आर्थिक अधिक होती है। मेलों को आयोजित करने का स्वरूप भी काफी कुछ बदल गया है। मेले अब आर्थिक गतिविधियों के केंद्र बन गए हैं। मेलों के आयोजक प्रयत्न करते हैं कि अधिक से अधिक व्यापारियों को इसमें बुलाया जाए तथा पर्याप्त मनोरंजन का भी इसमें प्रबंध हो जिससे अधिक से अधिक लोग मेला देखने आए। इस प्रकार आयोजक प्रयत्न करते हैं कि उन्हें और व्यापारियों को अधिक से अधिक लाभ  हो।

सांस्कृतिक आदान-प्रदान के साथ आर्थिक गतिविधियों का केंद्र

धार्मिक मेलों के अलावा बड़े बड़े व्यवसायियों  और सरकार  द्वारा व्यापारिक मेलों का आयोजन किया जाता है जैसे पशु मेला , पुस्तक मेला,  प्रगति मैदान का अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेला, ग्वालियर व्यापार मेला आदि। इसके अलावा समय- समय एक्सपो, एग्जीबिशन , प्रदर्शनी जैसे मोटर एक्सपो, फैशन शो इत्यादि का भी औद्योगिक घरानों और व्यवसायियों द्वारा आयोजन किया जाता है। जिसका  मुख्य उद्देश्य होता है विभिन्न कंपनियों द्वारा निर्मित नए-नए  उत्पादों की लोगों को जानकारी देना तथा  बिक्री करना।

इस प्रकार मेले, त्यौहार और उत्सव ना केवल मनोरंजन मेल मिलाप और  सांस्कृतिक आदान-प्रदान के साधन  हैं बल्कि आर्थिक गतिविधियों के भी प्रमुख केंद्र होते है जिससे कई लोगों की रोजी रोटी और रोजगार जुड़ा हुआ है।  सरकार को चाहिए कि इस प्रकार के मेलों को आयोजित करने में आयोजकों को  सहायता प्रदान करें विशेषतः  ग्रामीण क्षेत्रों में।  जिससे कि ग्रामीण लोगों को अपने उत्पाद के बारे में  जानकारी देने और उन्हें बेचने के लिए  उचित बाजार उपलब्ध हो सके। साथ ही ऐसे मेलों को विभिन्न जन संचार  माध्यमों खासकर इलेक्ट्रॉनिक माध्यम- रेडियो,  टीवी और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए प्रचारित और प्रसारित करें

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