कला संस्कृति

कभी भूखे पेट भी सोना पड़ता है….

By Harish

कभी भूखे पेट भी
सोना पड़ता है
कभी अकेले में
रोना भी पड़ता है,

सपनों को अपने
संजोना भी पड़ता है
अपनों को कभी
खोना भी पड़ता है,

कुछ बेगाने
अपने हो जाते हैं
कुछ जिगरी यार
बिछड़ जाते हैं,

वह स्वादिष्ट पकवान
वह हँसी-मज़ाक
अपनों के संग
कुछ धुंधले से,
फीके पड़े
होली के रंग,

वह खेल
मेरे बचपन का
वह शोर-शराबा
अल्हड़पन का,
गुम हुए सब
बिछड़ गए सब,

जब हम हुए
घर से दूर
चूल्हा-चौका करने को
हुए मजबूर,
आता न था
खाना बनाने को
पर चाहिए था
भरपेट खाने को
तब हम नालायक थे
अपने घर के,

सुननी पड़ती थी
खरी-खोटी
अनुमान न था
इसका कभी
खाने को मिलेगी
जली हुई रोटी

हरीश, हरदा पहाड़ी

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