साहित्य

रोको मत, इस चिलचिलाती धूप में उनको…

By G D Pandey

रोको मत, इस चिलचिलाती धूप में उनको

. करो व्यवस्था दुरुस्त, पहुंचाने उनके गांव तक उनको

कहां है व्यवस्था रेलगाड़ियां और बसें चलाओ उनको

जल्दी करो मत टूटने दो मजदूरों के सब्र को

और अधिक मत गर्म करो उनके क्रांतिकारी खून को.

विपदा की तपन से बाहर निकाल दो उनको.

रोको मत, इस चिलचिलाती धूप में उनको.

करो व्यवस्था दुरुस्त, पहुंचाने उनके गांव तक उनको..

समझो और समझाओ लोकतंत्र के इस बड़े तंत्र को.

भारत भाग्य विधाता और राष्ट्र निर्माता है वे.

अगर टूट जाए बांध उनके सब्र का तो,

ताज और तख्त भी पलट देते हैं वे.

व्यंग्य-जानिए टिंबकटू में खोरोना होने की दास्तां

रोको मत, इस चिलचिलाती धूप में उनको.

करो व्यवस्था दुरुस्त, पहुंचाने उनके गांव तक उनको..

मजबूर नहीं, मजबूत है जनशक्ति मजदूरों की वे.

दया की भीख नहीं, स्वाभिमान के पात्र है वे.

दास नहीं, स्वतंत्र भारत के नागरिक हैं .

मां भारती के सरताज, श्रमजीवी आवाम हैं ..

रोको मत, इस चिलचिलाती धूप में उनको.

करो व्यवस्था दुरुस्त, पहुंचाने उनके गांव तक उनको..

लेखक भारत सरकार के आवासन एवं शहरी कार्य  मंत्रालय के प्रशासनिक अधिकारी पद से अवकाश प्राप्त हैं। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में लेखन और संपादन से जुड़े हैं।

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