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कला संस्कृति

बेटी की पुकार….

By Harish

आओ माँ, बचाओ माँ,
आँचल में अपने, छुपाओ माँ
कैसे रहूँगी मैं जीवित
मुझको बचालो माँ,

दहल उठता है
सारा घर,
मेरे करुण क्रन्दन से
सोता जब सारा घर
मैं जग कर रोती माँ,

क्यों सौप दिया
हैंवानों को,
क्यों मुझको ऐसा घर
दे दिया माँ,

बहता लहू
तन से मेरे
मन में आघात
भी होता माँ,

रोती बिलखती
बहन जिसकी,
उस भाई को भी
बुलाओ ना माँ,
कौन समझेगा
मेरी पीड़ा,
कौन लगाएगा
घावों पर मरहम,

क्यों सौपा
इन दरिंदों को,
मेरे अपनों को भी
बुलाओ ना माँ,

mother

रह- रह कर
बहते आँसू,
रोती चीख-चीख कर
मुझको गले लगालो ना माँ,
करते थे संकोच
डाॅटने पर भी,
हुई क्या दशा आज
पिता को मेरे
बतलाओ ना माँ,
आओ माँ, बचाओ माँ
आँचल में अपने, छुपाओ माँ ll

आज एक ऐसी पोस्ट देखी जिससे मानवता को शर्मशार होते हुए देखा, मेरी यह पंक्तियां उस बहन को समर्पित जिसने ऐसी दर्दनाक पीड़ा सही l 

हरीश, हरदा पहाड़ी

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