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अपनी बात

मानव की शारीरिक संरचना को समझने की जिज्ञासा

By G D Pandey

सभी विद्यार्थी यह जानना चाहते हैं कि मानव शरीर की रचना कब और कैसे हुई़? इस प्रश्न के उत्तर के लिए दो अलग-अलग दृष्टिकोण हैं। आध्यात्मिक दृष्टिकोण  के प्रचारक तथा  दकियानुसी मतावलम्बी आदि अनादि काल से चली आ रही धारण का अनुसरण करते हुए कहते हैं कि मनुष्य की कद कांठी, उसका दिमाग, उसकी आयु, उसका पारिवारिक स्तर, उसकी उपलब्धियां, उसकी रूग्ण या निरोगी काया, उसका भाग्य इत्यादि सब कुछ विधाता के पास से निर्धारित होकर आता है। इन सब चीजों को समझना मनुष्य की पहुँच से बाहर की बात है। ‘बिना ऊपर वाले की मर्जी के पत्ता भी नहीं हिल सकता, जिसके उस लोक के कर्म अच्छे थे विधाता ने उसे इस लोक में मालिक बनाकर भेजा है और जिसके उस लोक के कर्म खराब थे उन्हें कामगार बनाकर इस लोक में भेज दिया’, ‘अच्छे स्कूलों में शिक्षा नसीब के अनुसार ही मिलती है’, इत्यादि-इत्यादि ।

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मठाधीश तार्किक बहस अथवा गहन विचार विमर्श करना नहीं चाहते

ऐसे मठाधीश और दकियानुसी लोग इस मामले में कोई तार्किक बहस अथवा गहन विचार विमर्श करना नहीं चाहते हैं। उनका सीधे ही यह कहना है कि ऐसे मामलों में न कोई तर्क का काम या कोई सवाल जवाब नहीं चलते हैं क्योंकि विधाता की लेख को आज तक न कोई पढ़ पाया, न कोई समझ पाया और ना ही कोई उसे मिटा पाया। ‘चंद ऋषि मुनियों तथा कुछ ऊँचे दर्जे के पंथ प्रचारकों के तार ही विधाता तक जुड़े होते हैं, उन्हें ही विधाता की अमिट  लेख का आभास हो जाता है और तदनुसार ही वे बड़े-बड़े मठ तथा पंथ चलाकर अनुयाइयों को ज्ञान दे सकते हैं’।

वैज्ञानिक तथा तकनीकी खोजों को खुले दिमाग से समझने की जिज्ञासा

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अतः मानव शरीर की संरचना नर और नारी तथा बच्चे सभी पूर्व निर्धारित रूप में दैवीय शक्ति की देन हैं, ऐसा आध्यात्मिक दृष्टिकोण समाज में अभी भी काफी हद तक व्याप्त है। समाज का एक तबका जो वैज्ञानिक दृष्टिकोण से परिचित हो चुका है वह तथ्यों तर्कों तथा सैद्धान्तिक आधार पर मानव तथा उसके विकास के मूलभूत कारकों को समझते हैं उस पर तर्कसंगत तरीके से विचार-विमर्श करते हैं और नई वैज्ञानिक तथा तकनीकी खोजों को समझने के लिए खुले दिमाग से जिज्ञासा भी रखते हैं। आस्थापरक जानकारी को भी तथ्यपरक और व्यावहारिक ज्ञान की तुला में तोलकर समझना चाहिए।

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अभी तक के वैज्ञानिक अन्वेषणों, अनुसंधानों तथा तकनीकी के क्षेत्रों में आई क्रांतियों ने समाज के बहुतायत हिस्से को यह समझने के लिए पर्याप्त ज्ञान मुहैया करा दिया है कि मनुष्य एक विकसित प्राणी है जिसका विकास एक दीर्घकालीन प्रक्रिया का नतीजा है । मानव सभ्यता के विकास की अनवरत प्रक्रिया ने मनुष्य को चिंतनशील, प्रगतिशील तथा खोजी प्रवृत्ति का एक सभ्य प्राणी बना दिया। अन्य प्राणियों की तरह ही मनुष्य ने भी अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करना सीखा। चार्ल्स डार्विन ने इस थ्योरी को प्रतिपादित किया और समाज के सामने रखा कि प्रकृति का हर प्राणी अपने अस्तित्व के लिए संघर्षरत है। ‘स्ट्रगल फाॅर इक्सीस्टैन्स’ (अस्तित्व के लिए संघर्ष ) तथा ‘सरवाइवल आफ द पिटैस्ट’ (योग्यतम की उत्तरजीवितता) के सिद्धांतों का अध्ययन करने से बुनियादी अवधारणायें स्पष्ट हो जाती हैं। महान वैज्ञानिक डारविन तथा लैमार्क ने जैविक विकास के सिद्धांतों की खोज की और यह साबित कर दिया कि इंसान का विकास वानर से हुआ है। मनुष्य और बंदर की शारीरिक संरचना लगभग एक सी है। पीछे के दो पैरों पर खड़े होकर भोजन के लिए आगे के दो पैरों (अग्रपादों) को ऊपर को उठाकर चलने के लम्बे अभ्यास (एक्सरसाइज) ने कई पीढ़ियों बाद धीरे-धीरे दो पैरों पर संतुलन बनाकर चलने तथा हाथों से अलग कार्य करने की शारीरिक क्षमता का विकास हुआ।

सारे बंदर मनुष्य क्यों नहीं बने?

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कुछ लोग एक स्वाभाविक प्रश्न कर सकते हैं कि यदि बंदर का विकास होकर वह मनुष्य बन गया तो फिर बंदर कहाँ से आ रहे हैं? या सारे बंदर मनुष्य क्यों नहीं बने? वैज्ञानिकों की खोज का निष्कर्ष इस संबंध में यह है कि पृथ्वी के जिस भू-भाग में बंदरों को जीवित रहने के लिए पर्याप्त भोजन मिलता रहा और अन्य सारी परिस्थितियां भी अनुकूल रहीं वहाँ पर उन्हें संघर्ष करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी और पीढ़ी दर पीढ़ी बंदरों का ही जीवन चलता आया है। लेकिन जो प्रजातियां संघर्षरत रहीं उनकी आवश्यकतानुसार उनके शरीर का ढांचा विकसित होने लगा और एप्स आदि मानव चिम्पांजी तथा गोर्रिल्ला आदि प्रजातियां कालान्तर में सभ्यता के विकास के विभिन्न युगों से गुजरते हुए विकासक्रम आगे बढ़ता गया।

जंगली जीवन से सामाजिक जीवन में मानव का पदार्पण हुआ। जिन स्थानों तथा भू खण्डों में जहाँ अनुकूल परिस्थितियां मौजूद थी या अभी भी हैं वहां बंदर आज भी खूब हैं। ने केवल बंदर बल्कि विकास क्रम में वही आगे बढ़ा जिसने संघर्ष किया, अभ्यास किया या परिस्थितियों ने बाध्य किया। कुछ लोगों को शायद यह जानकारी नहीं होगी कि मनुष्य के शरीर में आज भी लगभक सौ अवशेषी अंग मौजूद हैं जिनका पूर्वजों के लिए शायद कोई उपयोग रहा हो लेकिन आज उनका उपयोग नहीं है जैसे शरीर के अंदर रपैन्डिक्स, मुंह में अक्ल दांढ (प्रीमोलर) आदि। जैविक विकास (आर्गनिक इवोल्यूशन) के ठोस प्रभाव वैज्ञानिकों ने उजागर किये जिनमें मनुष्य की शारीरिक संरचना  विभिन्न जानवरों से काफी हद तक मेल खाती है।

इसको अच्छी तरह समझने के लिए जैविक विकास की थ्योरी को समझने और समरूप अंग, समजात अंग, अवशेषी अंग तथा जीवाश्म का सामान्य ज्ञान हो जाने से अवधारणा स्पष्ट हो जायेगी। पूरे ब्राह्मांड तथा जीव की उत्पत्ति के लिए वैज्ञानिक जगत की सबसे अधिक चर्चित बिग बैंग थ्योरी का अध्ययन करना चाहिए।

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मनुष्य का शरीर 206 छोटी-बड़ी हड्डियों का एक कंकाल

जन्तु जगत का पहला प्राणी एक कोशिकीय (यूनी सेलुलर) अमीबा है। अमीबा की खोज एक वैज्ञानिक अगस्त जोहान रोसेल ने सन 1755 में की थी। उनके अनुसार अमीबा और पैरामीशियम जैसे एक कोशिकीय जीव कोशिका विभाजन के दौरान दो समान अद्धों में केवल विभक्त होकर नये जीवों को उत्पन्न करते हैं। इस प्रक्रिया को कोशिका विखण्डन कहते हैं इससे उनसे एक कोशिकीय जीव उत्पन्न होते हैं। प्राणी जगत में एक कोशिकीय, द्वि-कोशिकीय तथा बहुकोशिकीय जीव मौजूद हैं। मनुष्य भी बहुकोशिकीय जीव है। मनुष्य का शारीरिक तंत्र अनेक कोशिकाओं, हड्डियों, मांसपेशियों, रक्त तथा धमनियों का एक सुव्यवस्थित तंत्र है। मनुष्य का शरीर 206 छोटी-बड़ी हड्डियों का एक कंकाल है जो मांसपेशियों को जकड़ कर मजबूती प्रदान करता है और एक आकृति प्रदान प्रदान है मनुष्य का शरीर विभिन्न अंगों तथा तंत्रों का एक वेमिशाल जाल है। तंत्रिका तंत्र, श्वसन तंत्र, आहार तंत्र आदि सभी केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र के मातहत काम करते हैं। केन्दीय तंत्रिका तंत्र का नियंत्रण केन्द्र मस्तिष्क है। मनुष्य के मस्तिष्क का वजन उसके शरीर के कुल वजन का 2 % बताया गया है। मस्तिष्क शरीर के सभी तंत्रों का नियमन एवं नियंत्रण करता है। यह सभी प्राणियों के सिर में एक खोपड़ी के अंदर सुरक्षित होता है। मस्तिष्क में लगभक 85 प्रतिशत पानी होता है। इसकी लम्बाई औसतन 167 मिमी तथा चौड़ाई 140 मिमी बताई गयी है।

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स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहना सर्वोच्च प्राथमिकता

मनुष्य के शरीर में रक्त धकेलने का काम हृदय का होता है। हृदय की हर धड़कन शरीर में रक्त धकेलने का प्रमाण होती है। मनुष्य का हृदय दो भागों में विभाजित है, मुख्य भाग बायीं तरफ तथा दूसरा भाग दायी तरफ होता है। हर भाग में दो चैम्बर होते हैं अर्थात मानव के हृदय में कुल चार चैम्बर होते हैं। हृदय का पोषण तथा आक्सीजन, रक्त के द्वारा मिलता है जो कोटोनरी धमनियों द्वारा प्रदान किया जाता है। मस्तिष्क के नियंत्रणाधीन सभी अंग अपना अपना कार्य करते हैं। इस संबंध में छात्र , नौजवान तथा अन्य लोग जो इन चीजों को समझने में रुचि लेते हैं उन्हें पुस्तकों के अध्ययन से पर्याप्त ज्ञान पाप्त हो जाता है। आज के दौर में भी पुस्तकों का अध्ययन प्रासंगिक है।
यह लेख छोटी कक्षाओं के विद्यार्थियों तथा अन्य सभी लोगों के समक्ष इसलिए प्रस्तुत है कि आज के दौर में जबकि मनुष्य का स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहना सर्वोच्च प्राथमिकता का विषय बन चुका है शरीर विज्ञान को जड़ से समझना यथासंभव वैज्ञानिक जानकारी हासिल करना भी एक आवश्यकता बन चुका है। अत:  सभी को मानव शारीरिक संरचना को समझने की जिज्ञासा रखनी चाहिए।

लेखक भारत सरकार के आवासन एवं शहरी कार्य  मंत्रालय के प्रशासनिक अधिकारी पद से अवकाश प्राप्त हैं। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में लेखन और संपादन से जुड़े हैं।

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