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राकेश ने “बुतपरस्ती मेरा ईमान नहीं ” में तलाशा कोरोना से बचने का प्रिकाॅशन

आशीष पाण्डे
कोरोना वायरस ने दिनचर्या बदलकर रख दी है। लाॅकडाउन के चलते लोग अपने घर तक सीमित रह गये हैं। ऐसे में दोस्तों से चैटिंग या फिर इंटरनेट सहारा बन रहे हैं। कुछ लोग इसके इतर क्रेटिव वर्क या फिर किताबें पढ़ने को कोरोना वायरस से लड़ने का बेस्ट प्रिकाॅशन बता रहे हैं। ऐसे ही एक युवा हैं पिथौरागढ़ के रई निवासी राकेश जोशी। वह आजकल वामपंथी लेखक व इतिहासकार लालबहादुर वर्मा की आत्मकथा का दूसरा खंड “बुतपरस्ती मेरा ईमान नहीं” पढ़ रहे हैं। राकेश 2018-19 में पिथौरागढ़ कालेज के छात्रसंघ अध्यक्ष रह चुके हैं। वर्तमान में एमएससी मैथ्स के छात्र हैं।

राकेश कहते हैं, दिनचर्या बदल चुकी है । लाॅकडाउन के कारण सारा दिन घर पर रहना है। टाइमपास के लिए लैपटॉप और फोन तो आपके पास हैं ही। मगर वायरस के दौर का उपयोग किताबें पढ़ने में किया जा सकता है। राकेश आजकल प्रो. लालबहादुर वर्मा की आत्मकथा का दूसरा भाग “बुतपरस्ती मेरा ईमान नहीं” पढ़ रहे हैं। राकेश बताते हैं कि यह किताब प्रो. वर्मा के जीवन और उनकी विचारधारा के विभिन्न पड़ावों को बयां करती है।

किताब निराशा के  क्षणों में भी अनवरत उम्मीद की किरण तलाशने और संवाद की राह बनाती एक इतिहासकार की कहानी है। यह महज आत्मकथा न रहकर, एक जन बुद्धिजीवी, सांस्कृतिक कर्मी, रंगकर्मी, संपादक, शिक्षक के जीवन पर आधारित है। इसमें साफगोई और ईमानदारी दिखती है। प्रो. वर्मा ने भंगिमा और इतिहासबोध सरीखी पत्रिकाओं के संपादन से जुड़े अनुभव साझा किये हैं। साथ ही इसमें गोरखपुर में सामाजिक और सांस्कृतिक मुहिम चलाने के प्रयासों का भी वर्णन मिलता है।
किताब में उच्चशिक्षा और उसकी सीमाओं पर भी चर्चा है। इसमें शिक्षकों की जिम्मेदारियों और उनकी असफलताओं के बारे में लिखा गया है। प्रो. वर्मा लिखते है “मैं शिक्षा को देने की नहीं लेने की चीज मानता हूँ। शिक्षक अधिक से अधिक एक फ़ैसिलिटेटर ही हो सकता है यानी वह शिक्षा लेने में मदद कर सकता है। उसके लिए जिज्ञासा जागा सकता है और अपने उदाहरण द्वारा प्रेरित कर सकता है और दूसरों को अपने से बेहतर शिक्षित हो जाने पर आनंदित हो सकता है।”

नोट – लाॅकडाउन के इस दौर में घर पर बैठकर आप क्या रहे हैं। अपने हालचाल या फिर बदली इस दिनचर्या के बारे में बताना चाहते हैं तो हमें 200 से 300 शब्दों में लिखकर भेजें।

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