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Coronavirus Lockdown : लाॅकडाउन के दौरान सौ में सत्तर आदमी

by G D Pandey

यह सर्वविदित है कि हमारे देश का सौ में सत्तर आदमी मेहनतकश वर्ग के अंतरगत आता है। इसका तात्पर्य यह है कि भारत की कुल जनसंख्या का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा मेहनत मजदूरी करने वाले लोगों का है। सामाजिक वर्ग विश्लेषण के अनुसार मेहनतकश वर्ग के तहत समाज के शोषित-उत्पीड़ित व वंचित तबके आते हैं। इसके अतिरिक्त समाज का वह तबका जिसके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है पाने के लिए सारी दुनिया है अर्थात सर्वहारा तबका।
कोविड 19 महामारी के परिपेक्ष्य में यदि देखें तो वे बेसहारा, वंचित, फुटपाथ पर रात गुजारने वाले, दो जून की रोटी के लिए मोहताज, जिसके पास कोई नियमित रोजगार नहीं, दिन में कहीं दिहाड़ी पर काम मिल गया तो रात को रोटी खाएं अन्यथा भूखे पेट ही सड़कों के किनारे फुटपाथों पर सर्दी-गर्मी की परवाह किये बगैर पड़े रहते हैं। इन सभी के खून का रंग भी अन्य मनुष्यों की तरह लाल ही होता है। ये लोग समाज के सबसे निचले तबके अर्थात आवश्यक जीविकोपार्जन के साधनों से पूरी तरह वंचित हैं। लाॅकडाउन के इस आपात काल में इनकी स्थिति निहायत दयनीय एवं विचारणीय है।

विपदा के दौर में मेहनतकश वर्ग को बचाना बड़ी चुनौती 

मेहनतकश वर्ग में समाज के जो अन्य तबके आते हैं, उनमें वे लोग शामिल हैं जिन्हें मेहनत मजदूरी का काम मिल जाता था। इसमें खेतीहर मजदूर अर्थात बड़े भूस्वामियों तथा बड़े-बड़े किसानों के खेत खलिहानों में मजदूरी का काम करके अपना गुजारा करने वाले श्रमिक शामिल हैं, जो मेहनतकश वर्ग का एक बहुत बड़ा हिस्सा है। औद्योगिक क्षेत्र के मजदूर जो फैक्ट्रियों व कारखानों में काम करते हैं, लोहे व कोयले की खदानों में जान हथेली पर रखकर काम करते हैं, बड़ी-बड़ी सरकारी तथा प्राइवेट अर्थात मालिक वर्ग की इमारतें बनाने में खून पसीना एक करते हैं, वे मेहनतकश वर्ग के अभिन्न अंग हैं।

Sau mein sattar aadmi

सरकारी कार्यालयों तथा अन्य पब्लिक सेक्टरों में आउटसोर्सिंग अर्थात कुछ समय के लिए ठेके पर ठेकेदार के माध्यम से सुरक्षा गार्ड, इमारतों का रखरखाव करने वाले, वाच एंड वार्ड (केयर टेकर)  का काम करने वाले, टायलेट से लेकर कार्यालयों के सभी कक्षों तथा फर्श की सफाई करने वाला मेहनतकश तबका, स्टेशनों पर सामान ढोने वाले, लादने-उतारने वाले श्रमिक, रेलवे कुली, छोटे से लेकर बड़े-बड़े होटलों में साफ सफाई का काम करने वाले, बड़े शहरों के नगर निगमों में साफ सफाई कर्मचारी जोकि लोगों के स्वास्थ्य की रक्षा करने में सहायक हैं वेे ठेकेदार के तहत दिहाड़ी मजदूर , छोटे शहर , कस्बों तथा निकायों में काम करने वाले दिहाड़ी मजदूर, ये सब मेहनतकश मजदूर वर्ग का हिस्सा हैं। लाॅकडाउन तथा महामारी के इस राष्ट्रीय विपदा के दौर में इन लोगों को जीवित रखना एक बहुत बड़ी चुनौती है। इस मायने के सभी जन संगठनों, गैर सरकारी संगठनों, सरकारी तंत्र तथा समाजसेवी संस्थाओं की ऐतिहासिक भूमिका से इस गंभीर चुनौती का मुकाबला किया जा सकेगा।

हमारे देश के छोटे-बड़े सभी शहरों, नगरों व कस्बों में असंगठित क्षेत्र का मजदूर भी मेहनकश वर्ग का एक बहुत बड़ा हिस्सा है। इसमें दिहाड़ी मजदूर, रेहड़ी, ठेला, खोमचा, पटरी तथा सड़कों के किनारे जगह-जगह पर मूंगफली, भुट्टे, फल सब्जियां, जूस इतिआदि बेचने वाले श्रमिक जो मालिक के पास दिहाड़ी पर काम करते हैं अथवा जो स्वयं भी मेहनत करके गुजारा करते हैं, रिक्शा चलाने वाले श्रमिक आदि लोगों की बहुत बड़ी तादात है। जब तक हमारा देश कोविड-19 महामारी से बचाव के एहतियाती उपायों पर अमल करेगा तब तक समाज के इस श्रमजीवी तबके को भी दो जून की रोटी मुहैया कराना लाजमी होगा।

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कोविड- 19 महामारी से मजदूरों पर दोहरा संकट

लाॅकडाउन के दौर में भारत के इस मेहनतकश वर्ग को दोहरे संकट से गुजरना पड़ रहा है। एक तो महामारी से बचने का संकट दूसरा जीवित रहने के लिए आवश्यक दाल रोटी का संकट । मध्यम वर्ग जोकि हमारे देश की जनसंख्या का लगभग तीस प्रतिशत हिस्सा होगा। उनके सामने प्रमुख संकट एक ही है कि महामारी से बचना, जीवित रहने के लिए भोजन, वस्तु और घर इतिआदि का संकट नहीं है। कोविड-19 महामारी से जंग लड़ना समाज के सभी वर्गों, देश के सभी नागरिकों का सर्वोच्च प्राथमिकता का विषय है। महामारी यह नहीं देखती है कि कौन शासक है और शासित है, कौन मालिक है और कौन मजदूर, इनके पास दौलत व शोहरत है और कौन सर्वहारा है, इन सब बातों को दरकिनार करके यह वैश्विक महामारी ने पूरी मानव जाति को ललकारा है और अपने घातक निशाने पर रखा है। इसीलिए सभी का एकजुट होना लाजमी हो जाता है। कोरोना वायरस द्वारा फैलाई गई कोविड -19 की इस महामारी में स्वयं को और दूसरों को बचाना तथा महामारी को एकजुट होकर हराना ही एकमात्र लक्ष्य होना चाहिए।

जहां तक समाज के वंचित लोगों व मेहनतकश जनता को दोहरे संकट से बचाने का प्रश्न है, इस संकट में उल्लेखनीय बात यह है कि केन्द्र सरकार तथा राज्य सरकारों ने समय रहते इस मामले में भी सोचना, योजनाएं बनाना तथा कार्य करना शुरू कर दिया था। इतनी बड़ी जनसंख्या वाले देश में नई और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में इस संक्रामक बीमारी से बचना, बचाना तथा आम जनता व मेहनतकश वर्ग को भोजन मिलना सुनिश्चित करने के लिए अचानक नए इंतजामात करना आसान काम नहीं है।

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मदद दया की भीख के तौर पर नहीं बल्कि इंसानियत के तकाजे से हो

हमारी केन्द्र सरकार तथा राज्य सरकारों ने गैरसरकारी संस्थाओं, समाजसेवी संगठनों तथा स्वयंसेवकों के साथ समन्वय करके बड़े-बड़े लंगर अर्थात सामूहिक भोजन का इंतजाम, पके हुए भोजन के पैकेट वितरण का काम तथा सामूहिक चूल्हा जैसी योजनाओं के जरिए जन भागीदारी से इस कार्य को आगे बढ़ाया जा रहा है। अभी तक किसी के भूख से मरने अथवा खाना न मिलने से बीमार पड़ने का कोई मामला नहीं आया है। यह सरकारों और सभी नागरिकों का दायित्व भी है कि हम जरूरतमंदों की मदद करें। मदद दया की भीख के तौर पर नहीं बल्कि इंसानियत के इस तकाजे से होनी चाहिए कि मेहनतकश वर्ग की बदौलत बांकी लोग सुख सुविधाओं का भोग कर रहे हैं। यदि खेतीहर मजदूर खेतों में किसानों की फसल का कार्य ना करें, यदि मजदूर इमारतों का काम ना करें, फैक्ट्रियों व कारखाने के मजदूर काम ना करें और तमाम जो भी कार्य मेहनतकश वर्ग कर रहा है वह ना करें तो मालिक वर्ग की सुख सुविधाएं कैसे कायम रहेंगी।अतः इस स्पष्ट अवधारणा के साथ जरूरतमंदों का सहयोग किया जाना चाहिए कि वे नहीं तो हम नहीं ।

लाॅकडाउन में छूट के साथ कोविड निर्देशों का पालन जरूरी

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सरकार की तरफ से बार बार यह घोषणा की जा रही है कि देश में अनाज के भंडार पर्याप्त मात्रा में भरे हैं, अनाज के वितरण की व्यवस्था भी की गयी है। इन कार्यों में जो भी वास्तविक दिक्कतें सामने आ रही हैं उनके निवारण का इंतजाम भी यथासंभव किया जा रहा है। इस बीच कई शिकायत निवारण केन्द्र भी सरकार की तरफ से खोले गए हैं। भारत सरकार के सभी मंत्रालय सक्रियता से कार्यरत हैं और किसी भी संभावित स्थिति से निपटने के लिए तैयारियों में जुटे हुए हैं। ऐसा लगता है कि इस वैश्विक महामारी की भारत में जो विपदा आन पड़ी है उसमें भारत का मेहनतकश वर्ग फिलहाल भूख से तो पीड़ित नहीं हो जाएगा। सरकार के सभी छोटे मझोले व सीमांत किसानों तथा बड़े किसानों के खेतों में काम करने वाले खेतीहर मजदूरों को लाॅकडाउन की परीधि से बाहर इस शर्त पर कर दिया है कि वे सुरक्षित दूरी अर्थात एक दूसरे से कम से कम एक मीटर की दूरी बनाए रखें और हमेशा काम करते या बाहर निकलते समय मास्क का प्रयोग अवश्य करें, साफ सफाई का विशेष ध्यान रखें। मनरेगा के तहत ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बनाए रखने के लिए भी रोजगार खोल दिया है। अन्य आवश्यक सेवाओं में कार्य करने वाले मजदूर भी काम पर जाएंगे बशर्ते कि ये सभी लोग भी कोविड निर्देशों का पूर्ण रूप से पालन करें। ग्रामीण क्षेत्रों के घरेलू उद्योगों में काम करने वाले लोगों के लिए भी 20 अप्रैल से लाॅकडाउन उपर्युक्त शर्तों के तहत खुल जाएगा।

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व्यायाम तथा योग मजबूत करेंगे शारीरिक तथा मानसिक शक्ति 
महानगरों , शहरों व कस्बों में सार्वजनिक भोजन वितरण की व्यवस्था सरकार तथा सभी सहयोगी एजेंसियों द्वारा की जा रही है। पूरे देश में चिन्हित गरीब लोगों के बैंक खाते में 500 रुपए प्रति खाताधारक के हिसाब से भेजा गया है। ये सब बातें यह दर्शा रही हैं कि इस समय देश में एक राष्‍ट्रीय नीति प्रचंड रूप से काम कर रही है। कोविड-19 से बचाव के सभी उपायों पर शक्ति से अमल करना सभी का दायित्व है। इसमें आर्थिक असमानता, राजनीतिक मतभेद तथा सामाजिक व धार्मिक समुदाय विशेष का कोई प्रश्न ही नहीं है। इसमें सभी का एकजुट रहना लाजमी है।
समाज के मेहनकश वर्ग को भी जारी कोविड निर्देशों, हेल्थ इको सिस्टम तथा इम्यूनिटी और सुदृढ़ करने संबंधी निर्देशों तथा एडवाइजरी का कड़ाई से पालन करना चाहिए। इस संबंध में एक बात उल्लेखनीय है कि व्यायाम तथा योग मनुष्य की शारीरिक तथा मानसिक शक्ति को सुदृढ़ बनाते हैं। मेहनतकश लोगों को तो यह सब रोजमर्रा की जिंदगी में अथवा शाररिक श्रम से मिल जाता है, उनकी इम्यूनिटी भी तुलनात्मक रूप से आमतौर पर औरों से बेहत्तर होती है, लेकिन इस महामारी के दौर में उन्हें भी गर्म पानी तथा काढ़े जैसी आसानी से उपयुक्त पेय पदार्थों का सेवन अवश्य करना चाहिए।

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स्वयं को सुरक्षित रखते हुए दूसरों की सुरक्षा में भी सहयोग
ऐसा मालूम होता है कि इस वैश्विक महामारी से जीत हासिल करने के लिए समाज के सभी तबकों का सहयोग तो सरकार को मिल ही रहा है, फिर भी सभी को अपने अपने स्तर से स्वयं को सुरक्षित रखते हुए दूसरों की सुरक्षा में भी सहयोग करना चाहिए। सरकारों को वंचित व जरूरतमंद जन समुदायों का विशेष ध्यान रखते हुए यह सुनिश्चित करना चाहिए कि आपदा के वक्त वे किसी भी स्तर पर भूख का शिकार न बनें। उन्हें कुछ समय तक आर्थिक सहायता, निशुल्क भोजन तथा बेघर लोगों को रहने की जगह मुहैया हो। निष्कर्ष के तौर पर यह कहा जा सकता है कि जब सौ में सत्तर आदमी अर्थात मेहनतकश वर्ग का ध्यान रखा जाएगा तो वह इस जंग में कोरोना वायरस को नेस्तनाबूद करके भारत को इस विपदा से बाहर निकालने में अहम भूमिका अदा करेगा।

लेखक भारत सरकार के आवासन एवं शहरी कार्य  मंत्रालय के प्रशासनिक अधिकारी पद से अवकाश प्राप्त हैं। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में लेखन और संपादन से जुड़े हैं।

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