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ऐहतियाती उपायों में कसावट, लाॅकडाउन में नरमाहट, अर्थव्यवस्था में गरमाहट

सोमवार से शुरू हो रहे लाॅकडाउन के तीसरे चरण में पूरे देश के जिलों को ग्रीन, आरेंज और रेड जोन में बांटा गया है। हालांकि लाॅकडाउन का तीसरा चरण 17 मई तक है, इसके तहत ग्रीन और आरेंज जोन में  सशर्त काफी छूट दे दी गयी है। ऐहतियाती उपयों को सख्ती से लागू करने तथा उनके बारे में जनमानस को जागरूक करने का खासा जोर दिया जा रहा है।

By G D Pandey

इस समय वैश्विक अर्थव्यवस्था के सामने सबसे बड़ा और अभूतपूर्व संकट पैदा कर दिया इस वैश्विक महामारी कोविड 19 ने। साम्राज्यवाद की जड़े हिलने लगी हैं। बहुराष्ट्रीय  कंपनियों तथा एकाधिकारी आर्थिक गुटों के सामने आधिपत्य को बरकरार रख पाने की चुनौती भस्मासुर की तरह खड़ी है। वैश्विक व्यापार को इस महामारी ने अपने काले कंबल में लपेट लिया है, जहां से बाहर निकलना नामुंकिन सा लगने लगा है। अमेरिकी तथा यूरोपीय आर्थिक एकाधिकारी गुटों का तैयार माल बंद पड़ा हुआ है, उसके लिए कोई मार्केट नहीं है। मांग और पूर्ति का पुराना आंकलन पिछले तीन महीने से अप्रासंगिक हो चुका है। कुछ एशियायी आर्थिक गुट अपने आका चीन के दम पर कुछ माल बाजार की वर्तमान मांग और पूति के आंकलन के अनुसार कर रहे हैं। कुछ भारतीय नवजात आर्थिक गुट भी फार्मास्युटिकल तथा स्वास्थ्य रक्षा दवाइयों व उपकरणों के उत्पादन में जुट गये हैं। भारत सरकार की ताजा रणनीति के तहत कोविड-19 बीमारी के ऐहतियाती उपायों में  कसावट तथा लाकडाउन में गरमाहट लायी जा रही है।

सोमवार से शुरू हो रहे लाॅकडाउन के तीसरे चरण में पूरे देश के जिलों को ग्रीन, आरेंज और रेड जोन में बांटा गया है। हालांकि लाॅकडाउन का तीसरा चरण 17 मई तक है, इसके तहत ग्रीन और आरेंज जोन में  सशर्त काफी छूट दे दी गयी है। ऐहतियाती उपयों को सख्ती  से लागू करने तथा उनके बारे में जनमानस को जागरूक करने का खासा जोर दिया जा रहा है।

दो गज की शरीरिक दूरी का पालन जरूरी

घर से बाहर निकलने की स्थिति में सभी के लिए मास्क तथा गम्छा मुंह में लगाना अनिवार्य है। भारतीय जनभाषा में ‘दो गज की दूरी’ का नारा इजात किया गया है। इसका मतलब है एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से दो गज की शरीरिक दूरी बनाते हुए अपने-अपने कार्य स्थलों पर कार्य करेंगे। ऐहतियाती उपायों में स्वच्छता रखने वाली आदतें भी शामिल हैं जैसे सार्वजनिक स्थानों पर धुम्रपान न करना, जगह-जगह पर थूकने व पेशाब करने की पुरानी असभ्य आदत को त्याग देना, बाहर से घर आकर तुरंत साबुन के झाग तथा पानी से अच्छी तरह हाथों को धोना, बार-बार नाक तथा मुंह में हाथ लगाने की आदत का परित्याग इतिआदि। अच्छी आदतें अपनाना समाज की सभ्यता की द्योतक है। मजदूर वर्ग के लिए भी यह साफ सफाई बहुत जरूरी है। बीड़ी पीने की आदत, जगह जगह थूकने की आदत अच्छी तरह हाथ न धोने की आदतें उन्हें तुरंत छोड़ देनी चाहिए।

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ऐहतियाती उपायों में स्वयं का बचाव और दूसरों का बचाव करना

किसी भी बीमारी का मुकाबला करने के लिए शरीर की रोग प्रतिरोधक शक्ति का सशक्त होना तथा उसे विकसित करना एक दीर्घ कालीन प्रक्रिया है। यदि शरीर को प्रकृति के अनुरूप ढालने तथा प्राकृतिक वातावरण के अनुकूलन का अभ्यास शरीर को कराया जाए और मेहनतकश वर्ग को न्यूनतम आवश्यकता के अनुसार रोटी-कपड़ा व मकान मिल जाए तो उनकी इम्युनिटी किसी भी वायरल अथवा बैक्टीरियल हमले का मुकाबला करके उसपर जीत कायम कर सकती है। वर्तमान में भी यह देखा जा रहा है कि कोविड -19 महामारी के शिकार वे लोग हो रहे हैं जो पहले से ही किसी बीमारी से ग्रस्त हैं अथवा शाररिक रूप से कमजोर हैं। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि स्वस्थ या सशक्त लोग इसकी चपेट में नहीं आ सकते। कोई भी व्यक्ति इस बीमारी से संक्रमित हो सकता है और दूसरों को संक्रमित कर सकता है। इसलिए स्वयं का बचाव और दूसरों का बचाव करना ऐहतियाती उपायों का केंद्र बिंदु है।

अर्थव्यवस्था में कुछ दिख रही गरमाहट

भारतीय अर्थव्यवस्था में लाॅकडाउन के तीसरे चरण में कुछ गरमाहट दिखाई पड़ रही है। सर्व विदित है कि भारतीय अर्थव्यवस्था एक मिश्रित अर्थव्यवस्था और दूसरे शब्दों में कहें तो अर्द्ध सामंती अर्द्ध औपनिवेशिक है। कृषि प्रधान देश होने के कारण भारतीय कृषि में अभी भी सामंतवाद अथवा सामंतवादी अवशेष किसी न किसी रूप में मौजूद हैं। अभी भारतीय कृषि का औद्योगीकरण नहीं हुआ है। लंबे समय से औपनिवेशिक दासता की जंजीरों में जकड़े रहने के कारण भारत की अर्थव्यस्था पूर्ण रूप से तो औपनिवेशिक नहीं रही क्योंकि राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ आर्थिक स्वतंत्रता हासिल नहीं हुई, इसलिए देसी कल कारखानों के विकास की स्थिति आज भी बहुराष्ट्रीय एकाधिकारी आर्थिक गुटों के आधिपत्य के कारण भारतीय बाजार की मांग को पूरा करने में पूरी तरह सक्षम नहीं है। जैसे तालाब में बड़ी मछली छोटी मछलियों को खा देती है उसी प्रकार वैश्विक बाजार में आर्थिक एकाधिकारी गुटों का आधिपत्य छोटे-छोटे देसी आर्थिक घरानों अथवा गुटों प्रतिस्पर्धा में मात दे देती है।

अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की कोशिश तेज

इस तरह की, अर्द्ध सामंती अर्द्ध औपनिवेशिक कहें या मिश्रित अर्थव्यवस्था कहें, अर्थव्यवस्था के चलते कोविड-19 महामारी ने भारतीय आर्थिक ढांचे को भी बेवस कर दिया है कि वह बाजार की वर्तमान आवश्यकता की वस्तुओं के उत्पादन की वैश्विक प्रतिस्पद्र्धा में अपना अस्तित्व खोजे। अभी हाल ही में भारत में मारुति सुजुकी कार बनाने वाली कंपनी ने कोविड-19 के उपचार में काम करने वाले वेंटिलेटर बनाने का नया काम शुरू कर दिया है।  ग्रामीण क्षेत्रों में ग्रामीण विकास, जल संसाधनों तथा विद्युत सप्लाई के कार्यों के लिए मनरेगा जैसी सरकारी योजनाओं के तहत ग्रामीण बेरोजगारों को कुछ रोजगार देकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कुछ गरमाहट बनाने की कोशिश शुरू कर दी गयी है। लाॅकडाउन में नरमी का रुख अपनाया जा रहा है। साथ ही शेष एतिहाती उपायों पर शक्ति करके भारतीय अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की कोशिश तेज की जा सकती है।

लेखक भारत सरकार के आवासन एवं शहरी कार्य  मंत्रालय के प्रशासनिक अधिकारी पद से अवकाश प्राप्त हैं। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में लेखन और संपादन से जुड़े हैं।

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