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कला संस्कृति

कोरोना में बहना का ‘रोना’, न आया भाई न ही भिटौली

by Digvijay Bisht

अल्मोड़ाजो भागी जियाला ईजू नौ रितु सुण ल वे, गयो रे मनखा ईजु काँ रितु सुणौ ल वे ……. (जो जीवित रहेगा वो ऋतुओं को देखेगा, जो व्यक्ति चला गया वो ऋतुओं को कहां देखेगा) जब यह रचना रची गई होगी तब रचनाकार ने बहुत आगे की सोची होगी। संभव है आज के दौर की
भी। चैती के बोल जब कानों में धुलते हैं तो ये हिया में मीठी सी एक कसक घोल देते हैं। आज कुमाऊं अंचल की बेटी, बहन, बहु, मां उदेखी गई हैं, भाई और बाबू भी व्याकुल हैं। चैत का महीना बहन-भाई के बिना मुलाकात के ही निकल सा गया। इस बरस का चैत बिना भिटौली के ही बीता जा रहा है। कोरोना (कोविड-19) ने तो किसी को नहीं बख्सा। भाई-बहन का कुमाऊं अंचल का सबसे बड़ा त्यौहार यों ही निकल गया।
वरिष्ठ पत्रकार, रंगकर्मी नवीन बिष्ट बताते हैं कि भिटौली की परंपरा स्हेन की परंपरा है। भाई-बहन के प्रेम के नाम शायद ही एक पूरा महीना दुनिया में कहीं और होता हो। आगे वह बताते हैं, “चली आ रही कहानी के अनुसार चिर काल में एक बहन बहुत दूर ब्याही थी। ईजा के कहने पर उसका भाई लम्बे समय के बाद अपनी बहन से मिलन गया। लम्बी दूरी पैदल चलने के बाद देर शाम बहन के घर पहुंचा। तो देखा बहन थकी-हारी सो रही थी। भाई सिरहाने बैठ बहन के जागने की प्रतीक्षा करने लगा। सुबह-सबेरे मां की चिंता में बेटा ईजा की भेजी भेंट पूरी, धोती, मिठाई बहन के सिरहाने रखकर घर को वापस चल दिया। बहन जब जागी तो उसने सिरहाने पर रखी तमाम भेंट देखी, तो व्याकुल बहन अपने भाई को खोजने लगी। जब भाई नहीं मिला तो बेसुध हो कहने लगी वो अपने भाई से मिल नहीं पाई और उसे एक बूंद पानी का भी नहीं पिलाई पाई। उसका भाई भूखा प्यासा ही चला गया। मैं अभागी उसे नजर भर देख भी नहीं पाई। भाई के वियोग में बहन के प्राण चले गए। भाई भी लम्बी पैदल यात्रा और भूख प्यास के कारण घर नहीं पहुंच पाया, रास्ते में ही उसकी मृत्यु हो गई।” भाई-बहन के इस अनोखे प्रेम से पैदा हुई है भिटौली की पंरपरा।

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भिटौली की अर्थव्यवस्था की कमर टूटी

आज वक्त की पगडंडियों में भिटौली (कुछ स्थान में आव भी बोलते हैं) ने भी अपने स्वरूप को थोड़ा बदला है। मीठी पूड़ियों के स्थान अब लड्डू और पेड़ों ने ले ली है। डाला या छापरी की जगह  बैग है। पैदल रास्ते नापना अब कम ही हो गया। वक्त के साथ सड़कों का जाल भी फैल गया है। भिटौली की अपनी एक पूरी अर्थ व्यवस्था हैै। जो इस बरस कोरोना ने चैपट कर दी है। पहाड़ों के छोटे-छोटे मिठाई के दुकानदारों को दीपावली से ज्यादा चैत का इंतजार रहता है। पूरे महीने उनको मिठाइयों के आर्डर मिलते हैं। वहीं बहनों को कपड़े देने की परंपरा के चलते कपड़े वालों के चेहरे भी खिले रहते हैं। इस साल सब निराश हैं, अपने-अपने घरों में कैद हैं।

कलयुग आ गया न जाने कैसी बीमारी आग लगी

जो लोग भिटौली में पूड़ियां ही देते हैं उनके घरों में पूड़ी  बनाने के लिए जुटने वाली महिलाएं भी आज खामोश हैं। ग्रामीण अंचलों में आज-कल काम की मारा-मारी कम होने से वे एकजुट हो दुखौल-सुखौल (सुख-दुख की बातें ) कहती थीं, मिलकर पूड़ियां बनाती थीं, कोरोना ने सबकुछ अस्त-व्यस्त कर दिया है। वायरस के डर से महिलाएं एक-दूसरे के घर जाने से कतरा रही हैं।
सरसों गांव निवासी पनुली देवी की शादी को 43 साल हो गए हैं। जब वह 15 बरस की थी ब्याह के ससुराल आ गई। तब से बिना नागा चैत में उनकी भिटौली आती रही है। पहली बार है कि उनकी भिटौली नहीं आई। बताती हैं कि पहले वह बड़ी शान से खुद भिटौली बांटने घर-घर जाती थी। आगे कहती हैं कि अब बहुएं जोड़ ली हैं तो पूरे गांव में आवा बांटने उनको ही भेजती हूँ। इस बरस तो कलयुग आ गया न जाने कैसी बीमारी आग लगी, घर से निकलना ही बंद हो गया है। खैर अगले बरस की भिटौली में दो नहीं चार लड्डू बांटूंगी।

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