bhagoriya hat
Uncategorized रोचक

यहां गुलाल लगाकर होता है प्रेम का इजहार

होली में अबीर गुलाल खूब उड़ता है मगर पश्चिम मध्य प्रदेश में गुलाल लगाने का मतलब प्रेम प्रस्ताव रखना भी होता है। भगोरिया हाट प्रेम के इजहार के लिए जाने जाते हैं। हफ्तेभर चलने वाले मेले 14 मार्च से शुरू हो रहे हैं । झाबुआ, धार, खरगोन और बड़वानी  आदिवासी बहुल जिलों में सौ से ज्यादा जगहों पर लगेंगे।


भगोरिया हाटों की सदियों पुरानी परंपरा जनजातीय युवाओं के बेहद अनूठे ढंग से जीवनसाथी चुनने की दिलचस्प कहानियों के लिये भी मशहूर है। इन कहानियों के मुताबिक भगोरिया मेले में आदिवासी युवक पान का बीड़ा पेश कर युवती के सामने अपने प्रेम का इजहार करता है और उसके चेहरे पर गुलाल लगा देता है। युवती के बीड़ा ले लेने का मतलब है कि उसने युवक का प्रेम निवेदन स्वीकार कर लिया है। इसके बाद यह जोड़ा भगोरिया मेले से भाग जाता है और तब तक घर नहीं लौटता, जब तक दोनों के परिवार उनकी शादी के लिये रजामंद नहीं हो जाते।


भगोरिया हाटों की सदियों पुरानी परंपरा जनजातीय युवाओं के बेहद अनूठे ढंग से जीवनसाथी चुनने की दिलचस्प कहानियों के लिये भी मशहूर है। इन कहानियों के मुताबिक भगोरिया मेले में आदिवासी युवक पान का बीड़ा पेश कर युवती के सामने अपने प्रेम का इजहार करता है और उसके चेहरे पर गुलाल लगा देता है। युवती के बीड़ा ले लेने का मतलब है कि उसने युवक का प्रेम निवेदन स्वीकार कर लिया है। इसके बाद यह जोड़ा भगोरिया मेले से भाग जाता है और तब तक घर नहीं लौटता, जब तक दोनों के परिवार उनकी शादी के लिये रजामंद नहीं हो जाते।

पश्चिमी मध्यप्रदेश के हजारों आदिवासी युवाओं को भगोरिया मेलों का बेसब्री से इंतजार रहता है। हर साल टेसू (पलाश) के पेड़ों पर खिलने वाले सिंदूरी फूल उन्हें फागुन के साथ उनके इस प्रमुख लोक पर्व की आमद का संदेश भी देते हैं। अपनी पारम्परिक वेश-भूषा में सजी आदिवासी टोलियां ढोल और मांदल (पारंपरिक बाजा) की थाप तथा बांसुरी की स्वर लहरियों पर थिरकती हुयी भगोरिया मेलों में पहुंचती हैं और होली से पहले जरूरी खरीदारी करने के साथ फागुनी उल्लास में डूब जाती है. 

ताड़ी (ताड़ के पेड़ के रस से बनी देसी शराब) के बगैर भगोरिया हाटों की कल्पना भी नहीं की जा सकती। दूधिया रंग का यह मादक पदार्थ इन हाटों में शामिल आदिवासियों की मस्ती को सातवें आसमान पर पहुंचा देता है.  

भगोरिया हाटों पर आधुनिकता का असर भी महसूस किया जाने लगा है, लेकिन इन वक्ती बदलावों के बावजूद इनमें आदिवासी संस्कृति के चटख पारंपरिक रंग अब भी बरकरार हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *