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डब्ल्यूएचओ से अमेरिका के बाहर होने के मायने

Report Ring Desk

अमेरिका विश्व का सबसे ताकतवर राष्ट्र माना जाता है और वहां के राष्ट्रपति भी पावरफुल शख्स। लेकिन हाल के कुछ महीनों से अमेरिका ने जिस तरह से व्यवहार किया है या जो गतिवधियां वहां घटित हुई हैं। उनसे यह आभास हो रहा है कि अमेरिका में अब वो बात नहीं है। बात-बात पर अमेरिकी नेता चीन को निशाना बनाते हैं, लेकिन जब खुद ज़िम्मेदारी निभाने का वक्त आता है तो पीछे हट जाते हैं। इतना ही नहीं शायद अमेरिका को यह डर भी सता रहा है कि कहीं चीन की अर्थव्यवस्था उसे पीछे न छोड़ दे। वजह जो भी हो, अमेरिका का हालिया प्रदर्शन निराश करता है। जब से कोरोना वायरस महामारी ने आतंक मचाना शुरू किया है, अमेरिका लाचार नज़र आया है। पहले महामारी फैलाने का दोष चीन पर मढ़ा, फिर विश्व स्वास्थ्य संगठन से हटने का फैसला। इन सब बातों से लगता है कि अमेरिका के लिए दुनिया में अपनी बादशाहत कायम रखना मुश्किल हो रहा है।

डब्ल्यूएचओ को फंडिंग रोकने से पहले भी अमेरिका इंटरनेशनल लेवल पर अपनी ज़िम्मेदारी से बचने की कोशिश कर रहा था। खासकर डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद। ट्रंप पेरिस जलवायु परिवर्तन समझौते से पहले ही किनारा कर चुके हैं। यह ऐसा एग्रीमेंट था जिसमें इंडिया, चाइना समेत 118 देशों ने हस्ताक्षर किए थे। अमेरिकी प्रशासन का दावा था कि 2015 में हुए क्लाइमेट एग्रीमेंट से अमेरिका के हितों को नुकसान पहुंच रहा है। यहां तक कहा गया कि इससे अमेरिकी नागरिकों का व्यापार और रोजगार आदि पर असर पड़ रहा है।

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वहीं अब डब्ल्यूएचओ से बाहर निकलने का फैसला वैश्विक ज़िम्मेदारी से मुंह मोड़ने का एक और उदाहरण है। भले ही अमेरिका ने इस ग्लोबल हेल्थ एजेंसी पर पारदर्शिता न बरतने का आरोप लगाया है। लेकिन जैसा कि हम जानते हैं कि अभी समूचा विश्व कोविड-19 के खिलाफ़ जंग लड़ रहा है, ऐसे में छोटे व कम विकसित देशों को मदद की सख्त जरूरत है। जो कि डब्ल्यूएचओ के माध्यम से पूरी की जा सकती थी, जिसके लिए अमेरिका जैसे विकसित देशों को आर्थिक मदद देनी चाहिए थी। लेकिन अमेरिका आने वाले समय में डब्ल्यूएचओ को कोई फ़ंडिंग नहीं देगा। इसका सीधा असर इस स्वास्थ्य एजेंसी के कामकाज पर पड़ेगा।
साभार-चाइना मीडिया ग्रुप

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