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विश्व में नई आर्थिक व राजनीतिक खेमेबंदी की आहट

कोविड -19 महामारी ने दुनिया के मौजूदा आर्थिक व राजनीतिक खेमेबंदी को झकझोर दिया है और नये ढंग से वैश्विक गुटबंदी के लिए जमीन तैयार कर दी है। ऐसी विकट आर्थिक स्थिति को सभालने तथा नये बाजार की तलाश के लिए नई आर्थिक व राजनीतिक खेमेबंदी की कवायद शुरु हो चुकी है। इस दिशा में दुनिया के तीन खेमों में गोलबंद होने की आहट का आभास होने लगा है। पहले खेमे में चीन, रूस, उत्तरी कोरिया तथा उनके घटक गोलबंद हो सकते हैं क्योकि इन देशों के बीच कोई आपसी अंतरविरोध दिखाई नहीं देता बल्कि संबंध मैत्रीपूर्ण दिखायी देते हैं।

By G D Pandey

कोविड -19 महामारी ने दुनिया के मौजूदा आर्थिक व राजनीतिक खेमेबंदी को झकझोर दिया है और नये ढंग से वैश्विक गुटबंदी के लिए जमीन तैयार कर दी है। पिछले चार महीनों में विश्व की समग्र अर्थव्यवस्था अचानक भर भराकर धराशाही होने लगी है। दुनिया संपूर्ण तालाबंदी में बंद हो गयी और अर्थ व्यवस्थाएं कोरोना वायरस के उपर समा गयी। आर्थिक गुट, बहुराष्ट्रीय कंपनियां, कारपोरेट घराने, एकाधिकारी ई कामर्स कंपनियां वस्तुओं की मांग और आपूर्ति में आई सुनामी जैसी स्थिति को सुरक्षित पूर्ण तालाबंदी में बंद रहकर ताकते रह गये। ऐसे मौके का फायदा उठाकर कुछ चीन आधारित गुटों ने हेल्थ केयर के लिए काम आने वाली वस्तुओं की भीषण मांग के चलते मास्क, पीपीई किट इतिआदि की आपूर्ति दुनिया के अधिकांश देशों में कर नये आर्थिक गठजोड़ का रास्ता तैयार करना शुरू कर दिया और दूसरी ओर अमेरिका जैसी आर्थिक महाशक्तियों के अधीन आर्थिक कंपनियों को पुरानी मांग पर आधारित दूसरी वस्तुओं की सप्लाई के लिए दुनिया का कोई मार्केट नहीं मिला। ऐसी स्थिति के चलते भारत में आधारित कुछ कंपनियों ने फारमेस्युटीकल उत्पादों की आपूर्ति दुनिया के तकरीवन 125 देशों में कोरोना मरीजों के उपचार के लिए फिलहाल मानवीय आधार पर की है । इसमें हाइड्रोेक्सी क्लोरोक्वीन, पैरासिटामोल आदि प्रमुख हैं।

अकेले अमेरिका में जनवरी से अप्रैल के बीच 45 लाख जाॅब समाप्त हुए

आज विश्व के सम्मुख सबसे बड़ी चुनौती कोविड- 19 माहामारी से निजात पाने की है। इस अभूतपूर्व चुनौती ने विश्व आर्थिक पटल पर दादागीरी करने वाले पहलवानों के दांत खट्टे कर दिए हैं। अमेरिका तथा संपूर्ण यूरोप के आर्थिक गुट अपने अपने आर्थिक ढांचे को ढहने से रोक नहीं पाये । दुनिया का जाॅब मार्केट (रोजगार का बाजार)  तहस नहस हो गया, अकेले अमेरिका में जनवरी से अप्रैल 2020 तक लगातार 45 लाख जाॅब समाप्त हो चुके हैं।

दुनिया के तीन खेमों में गोलबंद होने की आहट

ऐसी विकट आर्थिक स्थिति को सभालने तथा नये बाजार की तलाश के लिए नई आर्थिक व राजनीतिक खेमेबंदी की कवायद शुरु हो चुकी है। इस दिशा में दुनिया के तीन खेमों में गोलबंद होने की आहट का आभास होने लगा है। पहले खेमे में चीन, रूस, उत्तरी कोरिया तथा उनके घटक गोलबंद हो सकते हैं क्योकि इन देशों के बीच कोई आपसी अंतरविरोध दिखाई नहीं देता बल्कि संबंध मैत्रीपूर्ण दिखायी देते हैं

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दूसरा खेमा नामी ग्रामी बाॅस अमेरिका अपनी  अगुवाई में इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी, आस्ट्रेलिया, वियतनाम इतिआदि को गोलबंद कर सकता है क्योंकि कोविड -19 महामारी के चलते चीन और अमेरिका के बीच अंतरविरोध तीखे और शुत्रुतापूर्ण हो रहे हैं और उक्त यूरोपीय देश अमेरिका के सुर में सुर मिला रहे हैं। उनके आपस में संबंध मैत्रीपूर्ण बनते जा रहे हैं। यदि वर्तमान दो महाशक्तियों चीन और अमेरिका के परस्पर अंतरविरोध इसी रफ्तार से आगे बढ़ते हुए शत्रुतापूर्ण अंतरविरोध की चरम सीमा में पहुंच गए तो यह कहना भी सार्थक हो सकता है कि भविष्य में विश्व युद्ध के हालात पैदा हो जाएंगे।

चीन और अमेरिका के बीच ट्रेड वार जैसे हालात

उल्लेखनीय है कि चीन और अमेरिका के बीच ट्रेड वार (व्यापार युद्ध) जैसे हालात तो पहले से ही चले आ रहे थे। ऐसा लगता है कि भविष्य में एक खेमे का नेतृत्व चीनी महाशक्ति के हाथ में और दूसरे खेमे का नेतृत्व अमेरिकी महाशक्ति के हाथ में होगा। बाजार में आर्थिक आधिपत्य के लिए संघर्ष और प्रतिद्वंद्विता राजनीतिक और सामरिक युद्ध के लिए जमीन तैयार करने का काम करती हैं।

मौजूदा हालात में गुटनिरपेक्ष आंदोलन और भारत

ऐसी परिस्थितियों में हमारा भारत कहां खड़ा है उल्लेख करने की आवश्यकता नहीं कि दिनांक 04 -05- 2020 को गुटनिरपेक्ष आंदोलन ( नाॅन एलाइन मूवमेंट) का शिखर सम्मेलन नई तकनीक अर्थात वीडियो कांफ्रेंस के जरिए संपन्न हुआ। यह गुट निरपेक्ष आंदोलन भी दुनिया का एक राजनीतिक गुट है। इस गुट में 125 देश हैं और इसका मकसद तत्कालीन दो महाशक्तियों सोवियत संघ तथा अमेरिका में से किसी में शामिल हुए बैगेर विश्व शांति के लिए मध्यस्तता करना था। यह तो सभी समझते हैं कि दो पहलवानों की लड़ाई में बीच बचाव करने यदि कोई गैर पहलवान जाएगा तो वह भी घूंसे खाकर ही लौटेगा या फिर वह केवल बातों से शांति व बचाव का रास्ता अपनाता रहेगा।

यहां पर इस बात की चर्चा करना महत्वपूर्ण है कि गुट निरपेक्ष आंदोलन के नाम पर जो खेमेबंदी आज भी मौजूद है, उसके सदस्य देश या तो अविकसित हैं या विकासशील हैं । इन दोनोें तरह के देशों को अपनी अपनी अर्थव्यवस्था को चलाने के लिए विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसे संस्थानों से ऋण लेना पड़ता है। इन वित्तीय संस्थानों में सबसे अधिक धन अमेरिका जैसी महाशक्तियों का जमा रहता है और ऋण भी उसी की सहमति पर मिलता है, इसलिए उसे कभी भी भारत ने नाराज नहीं किया है। अमेरिका के विरोध में अभी तक भारत कभी भी खुलकर नहीं आया है। 04 मई 2020 के शिखर सम्मेलन को भारत के प्रधानमंत्री ने भी संबोधित किया। भारत एक विकासशील देश होने के कारण न तो किसी महाशक्ति की गलत नीतियों का खुलकर विरोध कर सकता है और ना ही गुट निरपेक्ष आंदोलन का कोई अन्य नेता देश महाशक्तियों को आंख दिखा सकता है।

लेखक भारत सरकार के आवासन एवं शहरी कार्य  मंत्रालय के प्रशासनिक अधिकारी पद से अवकाश प्राप्त हैं। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में लेखन और संपादन से जुड़े हैं।

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